रविवार, 8 दिसंबर 2013

शुरुआत

ये लीजिये आ गए परिणाम ,
बहुत आशा अनुरूप नहीं थे पर भारतीय लोकतंत्र के अनुरूप अच्छे माने गए | अंतिम सप्ताह में कुछ कमिया रही जिन्हें आगे सुधारना होगा | कुछ भ्रम भी फैलाये गए | पर अब धुंध छट गयी है | आगे वोटर में विश्वास भी बढेगा |
एक लिहाज से बहुत ठीक भी रहा की हम विपक्ष में बैठेंगे | कई विधायको के लिए विधानसभा में जाना बहुत नया अनुभव होगा | राजनीति के लिहाज से सीखने का बहुत अच्छा समय |
कांशीराम ने कहा था पहला चुनाव हारने के लिए लड़ा जाता है , दूसरा हराने के लिए तथा तीसरे जीतने के लिए ... इस लिहाज से आप का प्रदर्शन शानदार रहा अपने पहले ही चुनाव में वो हराने की स्थिति में तो आ ही गये है | 
लेकिन समय बहुत आत्ममुग्धता का भी नहीं है | मीडिया में आज जैसा महिमा मंडन किया उससे बहुत खुश न अरविन्द होंगे न ट्रू आपियन्स |
क्युकी हमारी राह बहुत लम्बी है, अभी तो शुरुवात है, एक वादा है व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष जारी रहेगा|

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

"स्वराज"- भारत का अधिकार



स्वतंत्रता सेनानी श्री बाल गंगाधर तिलक ने कहा था की "स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" ये पंक्तिया भारत की आजादी का मूल मंत्र बनी और देश को आजाद करा गयी | आजादी के ६७ साल बाद ये पंक्तिया पुनः प्रासंगिक लगने लगी है | क्या हमारा स्वराज भी कही खो चुका है ? या ऐसा तो नहीं है की आजादी के बाद हम फिर से सामंती लोकतंत्र या कह दे दिखावटी लोकतंत्र का एक हिस्सा मात्र रह गए है ? क्योंकी सत्ता किसी भी पार्टी को मिले आम आदमी की हालत कमोबेश एक सी है | इस सत्ता को शायद एक नए प्रयोग की ज़रूरत है जो पुराने और बीमार लोकतंत्र से कुछ अलग है |

पिछले दिनों मैंने इसी तरह के एक नए विचार को जाना - "स्वराज"

एक बहुत बुनियादी तरीका भारत की खोई हुई अस्मितापूर्ण स्वतंत्रता को पाने के लिए | स्वराज एक ऐसा तंत्र होगा जो निर्णय लेने की प्रणाली को आम आदमी के पास पहुचायेगा | इसमें हर व्यक्ति खुद निर्णय लेगा की उसे पहले अपने नल में पानी चाहिए या गली के बाहर  पानी का फव्वारा | या की उसे अपने बच्चो की अच्छी शिक्षा चाहिए या आठवी पास करने पर टेबलेट | इस प्रणाली में हर छोटा निर्णय जो हमारे आसपास को प्रभावित करने वाला है हमारे द्वारा मिल कर लिया जायेगा, न की कुछ लोगो द्वारा, जो की ऐसी ऑफिस में बेठे अफसरों द्वारा...

दिल्ली के सीलमपुर में शुरुआती प्रयोग बेहद सफल रहे है | महज दो महीने में लगभग सभी घरेलु शिकायते पूरी हो गयी | अगर इसे और व्यापक क़ानूनी जामा पहनाया जाये तो भारत में बदलाव यक़ीनन आएगा |       

किताब का लिंक निचे है, हिंदी इंग्लिश दोनों में है |  समय निकल के पढियेगा जरुर | हा पढ़ते समय अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों को थोडा शांत कीजियेगा वरना कुछ अच्छा पढने से चुक जायेंगे
http://iacmumbai.org/downloads.php?id=Tmc9PQ==

बाकी बात अगले पोस्ट पर....
जय हिन्द |

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

"Main Upasthit hu Yahan" By Balkavi Bairagi


One of My Favorite poem by bairagi jee
आज मैंने सूर्य से बस ज़रा सा यूँ कहा
‘‘आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा ?’’
तमतमा कर वह दहाड़ा—‘‘मैं अकेला क्या करूँ ?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।’’

हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के
जो न दें हमको उजाला वे भला किस काम के ?
जो रात भर लड़ता रहे उस दीप को दीजे दुआ
सूर्य से वह श्रेष्ठ है तुच्छ है तो क्या हुआ ?
वक्त आने पर मिला ले हाथ जो अँधियारे से
सम्बन्ध उनका कुछ नहीं है सूर्य के परिवार से।।

यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की
‘सूर्यनिष्ठा’ सम्पदा होगी गगन के कोष की
यह धरा का मामला है घोर काली रात है
कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे
‘दीपनिष्ठा’ को जगाओ अन्यथा मर जाओगे।।

है अमावस से लड़ाई, युद्ध है अँधियार से
इस लड़ाई को लड़ें अब कौन से हथियार से ?
एक नन्हा दीप बोला-‘‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ
रोशनी की खोज में आप जाते हैं कहाँ ?
आपके परिवार में नाम मेरा जोड़ दें
(बस) आप खुद अँधियार से यारी निभाना छोड़ दें।’’