स्वतंत्रता सेनानी श्री बाल गंगाधर तिलक ने कहा था की "स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" ये पंक्तिया भारत की आजादी का मूल मंत्र बनी और देश को आजाद करा गयी | आजादी के ६७ साल बाद ये पंक्तिया पुनः प्रासंगिक लगने लगी है | क्या हमारा स्वराज भी कही खो चुका है ? या ऐसा तो नहीं है की आजादी के बाद हम फिर से सामंती लोकतंत्र या कह दे दिखावटी लोकतंत्र का एक हिस्सा मात्र रह गए है ? क्योंकी सत्ता किसी भी पार्टी को मिले आम आदमी की हालत कमोबेश एक सी है | इस सत्ता को शायद एक नए प्रयोग की ज़रूरत है जो पुराने और बीमार लोकतंत्र से कुछ अलग है |
पिछले दिनों मैंने इसी तरह के एक नए विचार को जाना - "स्वराज"
एक बहुत बुनियादी तरीका भारत की खोई हुई अस्मितापूर्ण स्वतंत्रता को पाने के लिए | स्वराज एक ऐसा तंत्र होगा जो निर्णय लेने की प्रणाली को आम आदमी के पास पहुचायेगा | इसमें हर व्यक्ति खुद निर्णय लेगा की उसे पहले अपने नल में पानी चाहिए या गली के बाहर पानी का फव्वारा | या की उसे अपने बच्चो की अच्छी शिक्षा चाहिए या आठवी पास करने पर टेबलेट | इस प्रणाली में हर छोटा निर्णय जो हमारे आसपास को प्रभावित करने वाला है हमारे द्वारा मिल कर लिया जायेगा, न की कुछ लोगो द्वारा, जो की ऐसी ऑफिस में बेठे अफसरों द्वारा...
दिल्ली के सीलमपुर में शुरुआती प्रयोग बेहद सफल रहे है | महज दो महीने में लगभग सभी घरेलु शिकायते पूरी हो गयी | अगर इसे और व्यापक क़ानूनी जामा पहनाया जाये तो भारत में बदलाव यक़ीनन आएगा |
किताब का लिंक निचे है, हिंदी इंग्लिश दोनों में है | समय निकल के पढियेगा जरुर | हा पढ़ते समय अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों को थोडा शांत कीजियेगा वरना कुछ अच्छा पढने से चुक जायेंगे
http://iacmumbai.org/downloads.php?id=Tmc9PQ==
बाकी बात अगले पोस्ट पर....
जय हिन्द |